मेकेदातु बांध:कर्नाटक ने नहीं छोड़ा “कावेरी जल”

National News

(नई दिल्ली)21जुलाई,2026

चेन्नई में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय ने मेकेदातु बांध मुद्दे पर कानूनी विशेषज्ञों के साथ विचार-विमर्श के लिए एक बैठक की। एक सरकारी विज्ञप्ति के अनुसार, सचिवालय में एक बैठक की अध्यक्षता करते हुए विजय ने शीर्ष अधिकारियों के साथ इस बात पर चर्चा की कि आगे क्या कदम उठाए जाएं, क्योंकि कर्नाटक ने तमिलनाडु के लिए कावेरी का पानी नहीं छोड़ा है। मुख्यमंत्री ने कर्नाटक के मेकेदातु बांध प्रस्ताव और उस पहल को रोकने के लिए राज्य द्वारा उठाए जाने वाले कदमों पर कावेरी तकनीकी प्रकोष्ठ के अधिकारियों और कानूनी विशेषज्ञों के साथ चर्चा की।

तमिलनाडु ने कर्नाटक के उस कदम का विरोध किया है जिसके तहत वह राज्य में कावेरी नदी पर मेकेदातु में एक जलाशय बनाना चाहता है; तमिलनाडु का कहना है कि इससे उसके हितों को नुकसान पहुंचेगा। इस बैठक में मुख्य सचिव एम. साई कुमार, जल संसाधन मंत्री एन. आनंद, लोक निर्माण मंत्री आधव अर्जुन, कानून मंत्री आर. निर्मल कुमार, एडवोकेट जनरल विजय नारायण और वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए।

संसद में चर्चा के लिए समय की मांग:
वहीं डीएमके ने कहा है कि दिल्ली में आयोजित कार्य मंत्रणा समिति (बीएसी) की बैठक में उसने कावेरी नदी पर मेकेदातु बांध बनाने की कर्नाटक सरकार की योजना पर संसद में चर्चा के लिए समय उपलब्ध कराने की पुरजोर मांग की है। पार्टी ने यह भी कहा कि उसने बैठक में इस सत्र के दौरान विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) संशोधन विधेयक, 2026 को पेश किए जाने का कड़ा विरोध किया। डीएमके के राज्यसभा सदस्य पी. विल्सन ने रविवार को सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा कि डीएमके अध्यक्ष एमके स्टालिन के निर्देशों के अनुसार, लोकसभा की कार्य मंत्रणा समिति (बीएसी) की बैठक में हमने कर्नाटक सरकार की मेकेदातु बांध निर्माण योजना 1तथा इस मामले में न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) के गठन की तमिलनाडु की मांग पर संसद में चर्चा के लिए समय उपलब्ध कराने की मांग।

डीएमके ने लगाया आरोप:
उन्होंने आरोप लगाया कि यदि पड़ोसी राज्य की यह योजना साकार होती है, तो इससे तमिलनाडु के किसानों और आम जनता के हित गंभीर रूप से प्रभावित होंगे। विल्सन ने कहा कि डीएमके ने बीएसी की बैठक में यह भी आपत्ति दर्ज कराई कि कड़े एफसीआरए संशोधन विधेयक से प्रभावित होने वाले हितधारकों और धार्मिक संस्थानों से अब तक कोई परामर्श नहीं किया गया है। इसलिए पार्टी ने मौजूदा संसदीय सत्र में एफसीआरए संशोधन विधेयक, 2026 को पेश किए जाने का कड़ा विरोध किया है। (साभार एजेसी)

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