(नई दिल्ली)30मई,2026
छत्तीसगढ़ में वन धन विकास केंद्र योजना आदिवासी क्षेत्रों में आर्थिक बदलाव का बड़ा जरिया बन रही है। कोरबा जिले के कटघोरा वन प्रभाग के अंतर्गत आने वाले डोंगनाला की 12 आदिवासी महिलाओं ने अपनी मेहनत से सफलता की नई इबारत लिखी है। हरिबोल स्वयं सहायता समूह से जुड़ी ये महिलाएं हर्बल उत्पादों के जरिए आत्मनिर्भर बनी हैं।
मजदूरी से उद्यमिता तक का सफर:
शासन द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक, मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के मार्गदर्शन और वन मंत्री श्री केदार कश्यप की पहल पर इस समूह का गठन किया गया था। समूह की 12 सदस्य महिलाएं पहले पूरी तरह दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर थीं, जिससे परिवार का भरण-पोषण करना कठिन था। शासन की योजना से जुड़ने के बाद, इन महिलाओं को स्थानीय स्तर पर उपलब्ध औषधीय पौधों और लघु वनोपज के प्रसंस्करण का अवसर मिला।
विशेषज्ञों से मिला प्रशिक्षण और तकनीकी सहयोग:
महिलाओं को व्यावसायिक रूप से दक्ष बनाने के लिए छत्तीसगढ़ राज्य लघु वन उत्पाद सहकारी संघ लिमिटेड और आयुर्वेद विशेषज्ञों द्वारा विशेष प्रशिक्षण दिया गया। सरकारी जानकारी के अनुसार, इन महिलाओं को हर्बल प्रसंस्करण, गुणवत्ता नियंत्रण, सुरक्षित पैकेजिंग और ब्रांडिंग के गुर सिखाए गए। इसी प्रशिक्षण का नतीजा है कि आज यह समूह त्रिफला चूर्ण, अश्वगंधा चूर्ण, हर्बल फेस पैक, हेयर पाउडर और टूथ पाउडर जैसे उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद तैयार कर रहा है।
26.11 करोड़ की बिक्री,आयुष विभाग का सहयोग:
समूह की आर्थिक प्रगति के आंकड़े बेहद प्रभावशाली हैं। सरकारी रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2020 से मार्च 2026 तक वीडीवीके डोंगनाला ने कुल 26.11 करोड़ रुपये की संचयी बिक्री दर्ज की है।
वित्तीय वर्ष 2024-25 में समूह को लगभग 38.90 लाख रुपये का शुद्ध लाभ और कमीशन प्राप्त हुआ। समूह को आयुष विभाग से एक बड़ा ऑर्डर मिला, जिससे उन्हें 20 लाख रुपये का मुनाफा हुआ।
बढ़ी आय और मिला राष्ट्रीय सम्मान:
इस सफल पहल के कारण समूह की हर महिला सदस्य की औसत वार्षिक आय अब बढ़कर 1.7 लाख रुपये हो गई है। आर्थिक मजबूती के साथ-साथ इन महिलाओं के आत्मविश्वास और निर्णय लेने की क्षमता में भी वृद्धि हुई है। इनके उत्कृष्ट कार्यों को देखते हुए, समूह को राष्ट्रीय स्तर पर ट्रायफेड (TRIFED) और छत्तीसगढ़ शासन द्वारा सम्मानित भी किया जा चुका है।
शासन के अनुसार, डोंगनाला के हरिबोल स्वयं सहायता समूह की यह सफलता दर्शाती है कि यदि सही प्रशिक्षण और बाजार उपलब्ध कराया जाए, तो ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों की महिलाएं बड़े उद्योगों को टक्कर दे सकती हैं। यह मॉडल आज पूरे प्रदेश के अन्य स्वयं सहायता समूहों के लिए एक मिसाल बन गया है।(साभार एजेंसी)
