(नई दिल्ली)26मई,2026
गोवा इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट के नेतृत्व में एक शोध दल ने एक ऐसा नया ढांचा तैयार किया है, जो सैटेलाइट तस्वीरों के जरिए सरकारी नीतियों की सफलता का सटीक मूल्यांकन कर सकता है। यह तकनीक उन स्थितियों में बेहद मददगार साबित होगी जहां सरकार के पास योजना शुरू करने से पहले का जमीनी डेटा या सर्वे उपलब्ध नहीं होता है।
यह महत्वपूर्ण अध्ययन GIM के जनरल मैनेजमेंट और पब्लिक पॉलिसी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर मुदस्सिर अहमद अखून, अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के डॉ. अभिषेक शॉ और आईआईएम अहमदाबाद की डॉ. विद्या वेमिरेड्डी द्वारा किया गया है। उनके इस शोध को प्रसिद्ध जर्नल ऑफ एग्रीकल्चरल इकोनॉमिक्स में प्रकाशित किया गया है।
सर्वे की कमी को दूर करेगी सैटेलाइट तकनीक:
अक्सर देखा जाता है कि विकासशील देशों में सरकारें बड़ी कृषि योजनाएं तो लागू कर देती हैं, लेकिन योजना शुरू होने से पहले की स्थिति का सही डेटा न होने के कारण यह पता नहीं चल पाता कि योजना कितनी प्रभावी रही। प्रोफेसर मुदस्सिर अहमद अखून के अनुसार, विकासशील देशों में डेटा की कमी के कारण अक्सर योजनाओं का मूल्यांकन नहीं हो पाता। हमारा यह शोध दिखाता है कि सैटेलाइट डेटा इस कमी को वैज्ञानिक तरीके से भर सकता है।
तेलंगाना की रयथु बंधु योजना पर हुआ परीक्षण:
शोधकर्ताओं ने इस तकनीक को परखने के लिए तेलंगाना सरकार की 2018 में शुरू हुई रयथु बंधु योजना का अध्ययन किया। इस योजना के तहत किसानों को खेती के लिए प्रति एकड़ 5,000 रुपये की नकद सहायता दी जाती है। 2021-22 तक तेलंगाना के कृषि बजट का लगभग 55% हिस्सा इसी योजना पर खर्च हो रहा था, लेकिन सर्वे डेटा की कमी के कारण इसके वास्तविक प्रभाव को मापना मुश्किल था।
10 किलोमीटर क्षेत्र का हुआ चुनाव
वैज्ञानिकों ने तेलंगाना की सीमा के दोनों ओर 10 किलोमीटर की एक संकरी पट्टी का चुनाव किया। इन क्षेत्रों को इसलिए चुना गया क्योंकि सीमा के दोनों तरफ की मिट्टी, मौसम और खेती की परिस्थितियां एक जैसी थीं, बस अंतर यह था कि एक तरफ (तेलंगाना में) योजना लागू थी और दूसरी तरफ (दूसरे राज्य) नहीं। टीम ने सैटेलाइट के जरिए लगभग 1,00,000 कृषि स्थानों की तस्वीरों की गहराई से जांच की।
फसल उपज में सुधार, उत्पादकता बढ़ी
अध्ययन के दौरान टीम ने पाया कि तेलंगाना में नकद सहायता मिलने के बाद खरीफ (मानसून) के मौसम में फसल की पैदावार में लगभग 1.47% से 2.05% तक की बढ़ोतरी हुई। मुख्य रूप से चावल, गेहूं और मक्का की पैदावार में सुधार दर्ज किया गया। डॉ. अभिषेक शॉ के मुताबिक, जांच में यह भी पाया गया कि योजना शुरू होने से पहले तेलंगाना की उत्पादकता पड़ोसी राज्यों से कम थी, जिससे यह पुष्टि होती है कि पैदावार में सुधार इसी योजना की वजह से हुआ है।
इस तकनीक का इस्तेमाल केवल कृषि तक ही सीमित नहीं है। डॉ. विद्या वेमिरेड्डी ने बताया कि इस ढांचे का उपयोग ‘पीएम-किसान’ जैसी बड़ी राष्ट्रीय योजनाओं और सड़क, पर्यावरण या सामाजिक कल्याण के कार्यक्रमों के मूल्यांकन के लिए भी किया जा सकता है। यह तकनीक उन दुर्गम क्षेत्रों, आपदा प्रभावित इलाकों या युद्ध ग्रस्त क्षेत्रों के लिए भी वरदान साबित हो सकती है जहां जाकर सर्वे करना संभव नहीं है। शोधकर्ताओं का मानना है कि इस पद्धति से सरकारों को भविष्य में अधिक प्रभावी और सटीक नीतियां बनाने में मदद मिलेगी।(साभार एजेंसी)
