(नई दिल्ली)05जुलाई,2026
बंगलुरू की 13 वर्षीय प्रतीती बोरदोलोई इटली के मोंटेसिल्वानो में आयोजित फिडे विश्व युवा शतरंज चैंपियनशिप 2026 में भारत की इकलौती पदक विजेता रहीं। बेंगलुरु की वुमन फिडे मास्टर (WFM) ने गर्ल्स अंडर-18 वर्ग में रजत पदक जीता। उन्होंने 11 राउंड में 9 अंक बनाए और पूरे टूर्नामेंट में अपराजित रहीं। उन्होंने खुद से पांच साल बड़ी प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ खेलते हुए टूर्नामेंट के सबसे प्रभावशाली प्रदर्शनों में से एक दिया।
फिडे विश्व युवा शतरंज चैंपियनशिप 2026 में भारत छह वर्गों में 13 खिलाड़ियों के साथ उतरा था, लेकिन पदक सिर्फ प्रतीती ने जीता। इस प्रदर्शन के साथ उन्होंने अपना पहला वुमन इंटरनेशनल मास्टर (WIM) नॉर्म भी हासिल किया और उनकी फिडे रेटिंग में 129 से ज्यादा एलो अंक जुड़े।
गैरी कास्पारोव से खास संयोग
प्रतीती की कहानी को और खास बनाता है एक दिलचस्प संयोग। उनका जन्म गैरी कास्पारोव के जन्म के ठीक 50 साल बाद 13 अप्रैल 2013 को हुआ था। गैरी कास्पारोव का जन्म 13 अप्रैल 1963 को हुआ था। जहां यह जन्मदिन का संयोग अपने आप में रोचक है, वहीं उनके कोच ग्रैंडमास्टर प्रवीण थिप्से का मानना है कि समानता सिर्फ तारीख तक सीमित नहीं है।
टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, प्रवीण थिप्से ने कहा,उनमें कुछ ऐसे गुण दिखते हैं। किसी टूर्नामेंट में खराब स्थिति में होने पर भी वह अच्छी योजना बनाती हैं ताकि वापसी करके शीर्ष पर पहुंच सकें। इटली में उनका यह जुझारूपन साफ नजर आया। 2129 की फिडे रेटिंग के साथ 16वीं वरीयता प्राप्त प्रतीती ने पूरे टूर्नामेंट में एक भी मुकाबला नहीं गंवाया। उन्होंने सात जीत और चार ड्रॉ के साथ 11 राउंड में 9 अंक जुटाए।
सिर्फ शतरंज नहीं, गणित में भी कमाल
प्रवीण थिप्से के अनुसार, प्रतीती सिर्फ शतरंज खिलाड़ी नहीं हैं। उन्होंने बताया, प्रतीती पूरी तरह सिर्फ शतरंज खिलाड़ी नहीं हैं। वह गणित की जादूगर हैं और सभी परीक्षाओं में प्रथम आती हैं। बेंगलुरु की रहने वाली प्रतीती ने इस साल अहमदाबाद में राष्ट्रीय अंडर-17 गर्ल्स चैंपियनशिप जीतकर विश्व युवा चैंपियनशिप के लिए क्वालिफाई किया था।
कोविड के दौरान शुरू हुई उड़ान:
उनकी मां प्रांति दत्ता बोरदोलोई के अनुसार, प्रतीती की शतरंज यात्रा को असली गति कोविड-19 महामारी के दौरान मिली। वर्षों की भारी औपचारिक ट्रेनिंग के बिना ही उन्होंने 2022 में सिर्फ नौ साल की उम्र में कर्नाटक स्टेट चैंपियनशिप जीतकर सबको चौंका दिया। इसके सिर्फ छह महीने बाद उन्होंने इंदौर में राष्ट्रीय अंडर-9 खिताब भी अपने नाम कर लिया।
अलग तरह की सोच:
प्रवीण थिप्से का कहना है कि प्रतीती किसी बात को आंख मूंदकर नहीं मानतीं। यदि उन्हें कुछ समझाया जाए तो वह तब तक सवाल पूछती रहती हैं जब तक पूरी तरह संतुष्ट न हो जाएं। उनके अनुसार यही आदत उन्हें बोर्ड पर स्वतंत्र सोच विकसित करने में मदद करती है। वह एंडगेम्स का अध्ययन भी पसंद करती हैं, जिसे कई जूनियर खिलाड़ी उबाऊ मानते हैं। प्रतीती के लिए वही हिस्सा सबसे आकर्षक है, क्योंकि उसमें तर्क और गणना की भूमिका अधिक होती है।
अनुशासन और संतुलन:
शतरंज के बाहर भी उनका रूटीन काफी व्यवस्थित है। वह लंबी नींद लेती हैं, पंचिंग बैग और साइक्लिंग से फिटनेस पर काम करती हैं और ऐसे परिवार में बड़ी हो रही हैं, जहां पढ़ाई को अब भी प्राथमिकता दी जाती है। उनकी मां कहती हैं कि परिवार पढ़ाई की कीमत पर शतरंज को आगे बढ़ाने में विश्वास नहीं करता। प्रतीती की मां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में पीएचडी हैं। वह यह भी बताती हैं कि प्रतीती को जीत का भावनात्मक पक्ष समझाया गया है। उन्हें सिखाया गया है कि हारे हुए प्रतिद्वंद्वी के सामने बहुत ज्यादा खुशी नहीं दिखानी चाहिए- कठोरता बोर्ड पर होनी चाहिए, उसके बाहर नहीं।
अब आगे क्या?
हाल ही में जब प्रतीती से उनके भविष्य के बारे में पूछा गया तो उन्होंने दो जवाब दिए। पहला यह है कि वह विश्व चैंपियन बनना चाहती हैं। दूसरा जवाब और छोटा था कि वह सिर्फ अच्छा खेलना चाहती हैं। 13 साल की उम्र में विश्व स्तर की प्रतियोगिता में भारत की इकलौती पदक विजेता बन चुकी प्रतीती बोरदोलोई के लिए शायद यही सबसे खास बात है।(साभार एजेंसी)
