पहली बार झरने,गाड़-गदेरों का हो रहा सर्वे

Uttarakhand News

(देहरादून)07जून,2026.

उत्तराखंड में पहली बार झरनों और गाड़-गदेरों की व्यवस्थित गणना की जा रही है। इसके जरिए राज्य में मौजूद प्राकृतिक जल स्रोत की वास्तविक संख्या और उनकी वर्तमान स्थिति का पता लगाया जाना है। सर्वेक्षण पूरा होने के बाद पहली बार सरकार के पास प्रदेश के झरनों और गाड़-गदेरों का प्रामाणिक और व्यापक रिकॉर्ड उपलब्ध होगा। अभी तक की गणना में 48 हजार प्राकृतिक जलस्रोतों का डाटाबेस तैयार किया जा चुका है।

लघु सिंचाई विभाग के अधिकारियों के अनुसार, झरनों और गाड़-गदेरों की गणना का काम अंतिम चरण में है और अगले एक महीने के भीतर इसे पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। सर्वेक्षण पूरा होने के बाद यह स्पष्ट होगा कि राज्य में कुल कितने प्राकृतिक जल स्रोत मौजूद हैं और उनकी माैजूदा स्थिति क्या है। कई स्थानों पर झरने सूख चुके हैं, वहीं अनेक स्रोत जलस्तर लगातार घट रहा है। ऐसे में यह सर्वेक्षण जल संकट की वास्तविक स्थिति समझने में मदद करेगा।

लघु सिंचाई विभाग के मुख्य अभियंता बीके तिवारी ने बताया कि प्राकृतिक जलस्रोतों की गणना केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं है। केंद्र सरकार देशभर में विभिन्न राज्यों की एजेंसियों और विभागों के सहयोग से जल स्रोतों का सर्वेक्षण करा रही है। इसका उद्देश्य एक राष्ट्रीय डाटाबेस तैयार करना है जिससे देश में मौजूद प्राकृतिक जलस्रोतों की संख्या, स्थिति और संरक्षण की जरूरतों का आंकलन किया जा सके। लघु सिंचाई विभाग की ओर से प्रदेश के सभी 13 जिलों में किए जा रहे सर्वेक्षण में अब तक करीब 48 हजार झरनों का रिकॉर्ड तैयार किया जा चुका है। इनमें सबसे ज्यादा करीब 9600 झरने, गाड़-गदेरे व अन्य प्राकृतिक जल स्रोत मौजूद हैं।

वन क्षेत्र के झरने व गदेरे शामिल नहीं:
अधिकारियों के अनुसार, वर्तमान सर्वेक्षण मुख्य रूप से राजस्व क्षेत्रों में स्थित झरनों और जल स्रोतों तक सीमित है। वन क्षेत्रों में मौजूद बड़ी संख्या में जल स्रोत अभी इस गणना का हिस्सा नहीं हैं। ऐसे में राज्य में झरनों और गाड़-गदेरों की वास्तविक संख्या मौजूदा आंकड़ों से कहीं अधिक हो सकती है। तैयार होने वाला डाटाबेस यह बताएगा कि कौन से जलस्रोत सुरक्षित हैं, कौन संकट में हैं और किन क्षेत्रों में संरक्षण कार्यों की आवश्यकता है।

प्रत्येक जलस्रोत की हो रही जियो-टैगिंग:
सर्वेक्षण को विश्वसनीय बनाने के लिए आधुनिक तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। प्रत्येक जलस्रोत की जियो-टैगिंग की जा रही है और मोबाइल एप्लिकेशन के माध्यम से उसकी लोकेशन, जल प्रवाह, उपयोगिता और भौगोलिक परिस्थितियों से संबंधित जानकारी दर्ज की जा रही है। इससे भविष्य में इन स्रोतों की निगरानी और संरक्षण कार्यों को बेहतर ढंग से संचालित किया जा सकेगा।

सूखे जल स्रोतों का होगा उपचार:
अधिकारियों के अनुसार, उनके एप में कई लोगों ने अपने क्षेत्र के जलस्रोत की जानकारी दी है जो सूख रहे हैं। इनमें से कुल 155 को चयनित किया गया है जिनका उपचार किया जा रहा है। इनमें रायपुर, कालसी, सहसपुर, चकराता, डोइवाला, विकासगर समेत अन्य क्षेत्रों के स्रोत शामिल हैं। बीके तिवारी ने बताया कि पुराने झरने, नौले-धारों के पुनर्जीवन का काम भी किया जा रहा है। इसके अलावा भूजल रिचार्ज का भी काम कर रहे हैं। इसके लिए कुल 21 रिचार्ज शाफ्ट लगाए गए हैं।

प्रारंभिक आंकड़ों की स्थिति:
अल्मोड़ा 9600
चमोली 8077
टिहरी 4415
उत्तरकाशी 4191
चंपावत 3911
पौड़ी 3143
पिथौरागढ़ 2821
बागेश्वर 2339
रुद्रप्रयाग 2268
देहरादून 1046
नैनीताल 711(साभार एजेंसी)

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