(नई दिल्ली)5जनवरी,2026
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर भेजी गई चादर को चढ़ाने से रोकने वाली याचिका खारिज कर दी। सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए याचिकाकर्ता जितेंद्र सिंह के वकील बरुन सिन्हा ने कहा कि जवाहरलाल नेहरू द्वारा 1947 में शुरू की गई मोइनुद्दीन चिश्ती की अजमेर दरगाह पर प्रधानमंत्री द्वारा चादर चढ़ाने की प्रथा बिना किसी कानूनी या संवैधानिक आधार के तब से जारी है।
कोर्ट ने केस पर टिप्पणी करने से किया इनकार:
मामले की सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा कि चूंकि यह मुद्दा न्यायोचित नहीं है, इसलिए कोर्ट इस पर कोई टिप्पणी नहीं करेगा। बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर साल उर्स के मौके पर ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर चादर भेजते हैं।
शिव मंदिर के खंडहर पर बनी है दरगाह: याचिकाकर्ता
अपना पक्ष रखते हुए याचिकाकर्ता के वकील बरुन सिन्हा ने दावा किया कि मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह का निर्माण शिव मंदिर के खंडहरों पर किया गया है और दरगाह के जमीन को लेकर एक मामला निचली अदालत में चल रहा है। ऐसे में केंद्र सरकार या राज्य सरकार की तरफ से की दरगाह को किसी भी तरह का सम्मान देना गलत है।
याचिका खारिज होने का केस पर नहीं पड़ेगा कोई असर:
हालांकि याचिका को खारिज करने के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि रिट याचिका खारिज होने का लंबित दीवानी मुकदमे पर कोई असर नहीं पड़ेगा। उन्होंने आगे कहा,आप दीवानी मुकदमे में जाकर उचित राहत की मांग करें। बता दें कि एक हिंदू संगठन के सदस्य याचिकाकर्ता जितेंद्र सिंह और विष्णु गुप्ता ने कहा कि वे केंद्र सरकार के विभिन्न माध्यमों द्वारा ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती को दिए जा रहे राज्य प्रायोजित औपचारिक सम्मान, आधिकारिक संरक्षण और प्रतीकात्मक मान्यता की निरंतर प्रथा से परेशान हैं, क्योंकि ऐतिहासिक अभिलेखों से पता चलता है कि मोइनुद्दीन चिश्ती उन विदेशी आक्रमणों से जुड़े थे जिन्होंने दिल्ली और अजमेर पर विजय प्राप्त की और देशी आबादी का बड़े पैमाने पर दमन और धर्मांतरण किया,जो भारत की संप्रभुता, गरिमा और सभ्यतागत मूल्यों के बिल्कुल विपरीत हैं।(साभार एजेंसी)
