उत्तराखंड सहायक अध्यापक भर्ती: हाईकोर्ट का इन उम्मीदवारों को झटका

Uttarakhand News

(नैनीताल)30नवंबर,2025.

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने प्राथमिक विद्यालयों में सहायक अध्यापक के पदों के लिए आवेदन करने वाले उन उम्मीदवारों को राहत देने से इनकार कर दिया है, जो अभी भी दो वर्षीय डीएलएड कोर्स कर रहे हैं। ऐसे उम्मीदवारों ने उत्तराखंड हाईकोर्ट से आवेदन जमा करने की अंतिम तिथि बढ़ाने का अनुरोध किया था। क्योंकि उनका परिणाम दिसंबर 2025 में आने की संभावना थी।

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा है कि विज्ञापन में निर्धारित अंतिम तिथि तक सभी आवश्यक योग्यताएं पूरी होनी चाहिए और न्यायालय का हस्तक्षेप चयन प्रक्रिया को पटरी से उतार देगा। उत्तराखंड के चंपावत और पिथौरागढ़ जिलों के जिला शिक्षा अधिकारी (प्रारंभिक) द्वारा सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में सहायक अध्यापक की नियुक्ति के लिए विज्ञापन जारी किए गए थे।
इन विज्ञापनों के अनुसार आवेदन करने के लिए उम्मीदवारों के पास स्नातक की डिग्री के साथ राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) द्वारा मान्यता प्राप्त संस्थान से दो वर्षीय डीएलएड, चार वर्षीय बीएलएड या दो वर्षीय डीएड होना आवश्यक है। चंपावत के लिए आवेदन जमा करने की अंतिम तिथि 28 नवंबर 2025 थी, जबकि पिथौरागढ़ के लिए यह 30 नवंबर 2025 है।

याचिकाकर्ता भास्कर मिश्रा व पंकज नौटियाल सहित अन्य ने अदालत से विज्ञापन की शर्तों में छूट देने और आवेदन जमा करने के लिए 15 दिन का अतिरिक्त समय देने का आग्रह किया था।साथ ही उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड रामनगर को उनकी अंतिम मूल्यांकन परीक्षा जल्द आयोजित करने और जल्द से जल्द परिणाम घोषित करने का भी निर्देश देने की मांग की थी, लेकिन न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी ने कहा कि आवेदन जमा करने की अंतिम तिथि निर्धारित करना नियोक्ता का एकमात्र विशेषाधिकार है। न्यायालय ने यह भी कहा कि इस तरह की समय सीमा को बढ़ाने से अन्य उम्मीदवार भी समान राहत का दावा कर सकते हैं, जिससे यह एक अंतहीन प्रक्रिया बन जाएगी।

न्यायालय ने अपने फैसले में अशोक कुमार शर्मा और अन्य बनाम चंद्र शेखर और अन्य (1997) 4 एसएससी 18 मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का उल्लेख किया। इस फैसले में यह स्थापित किया गया है कि किसी पद के लिए पात्रता का आकलन केवल आवेदन जमा करने की अंतिम तिथि के संदर्भ में किया जाना चाहिए, और जो व्यक्ति उस निर्धारित तिथि के बाद योग्यता प्राप्त करता है।उस पर विचार नहीं किया जा सकता है।

उच्च न्यायालय ने कहा कि भले ही सार्वजनिक रोजगार पर विचार करने का अधिकार एक मौलिक अधिकार है, लेकिन यह केवल उन व्यक्तियों तक फैला हुआ है जो संबंधित नियमों द्वारा निर्दिष्ट सभी पात्रता मानदंडों को पूरा करते हैं।इन दलीलों के आधार पर उच्च न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ताओं के पास अभी तक आवश्यक शिक्षक प्रशिक्षण योग्यता नहीं है।केवल डीएलएड कोर्स करने से वे पात्र नहीं हो जाते, वे तभी पात्र होंगे जब उन्हें उत्तीर्ण होने का डिप्लोमा या डिग्री प्रदान की जाएगी। नतीजतन, न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं द्वारा मांगी गई राहत को अस्वीकार कर रिट याचिकाओं को खारिज कर दिया(साभार एजेंसी)

Share it

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *