दिल्ली में सरकारी सेवाओं की समय सीमा तय,विलंब पर जुर्माना

National News

(नई दिल्ली)16जुलाई,2026

दिल्ली की जनता को अब सरकारी दफ्तरों के बार-बार चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे. मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता सरकार ने ‘दिल्ली राइट ऑफ सिटिजन टू टाइम बाउंड एंड ईज ऑफ डिलीवरी ऑफ सर्विस बिल, 2026’ को मंजूरी देकर प्रशासनिक सुधार की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. आज कैबिनेट की बैठक में मुहर लगने के बाद, अब नागरिकों को समयबद्ध तरीके से सरकारी सेवाएं प्राप्त करना उनका कानूनी अधिकार होगा‌।

अधिकारियों की बढ़ेगी जवाबदेही:
इस नए विधेयक की सबसे बड़ी खासियत सरकारी अधिकारियों की जवाबदेही तय करना है. अक्सर सरकारी फाइलों में देरी या लापरवाही के कारण नागरिकों को परेशानी का सामना करना पड़ता है, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा. यदि किसी अधिकारी ने बिना किसी ठोस कारण के सेवा देने में देरी की, तो उन पर प्रतिदिन 250 रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा, जिसकी अधिकतम सीमा 5,000 रुपये निर्धारित की गई है. साथ ही, अनुचित तरीके से आवेदन खारिज करने पर भी अधिकारियों पर भारी जुर्माना लगेगा. हालांकि, कानून यह भी सुनिश्चित करता है कि अधिकारी को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दिया जाएगा, जिससे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की रक्षा हो सके।

स्वतः अपील प्रणाली: अब कहीं भागने की जरूरत नहीं:
इस बिल में ‘ऑटोमैटिक एस्केलेशन’ या स्वतः अपील की व्यवस्था को जोड़ा गया है. अगर कोई अधिकारी तय समय-सीमा के भीतर काम नहीं कर पाता है, तो नागरिक को अलग से कहीं अपील करने की आवश्यकता नहीं होगी. यह मामला स्वतः ही विभाग के ‘नागरिक शिकायत निवारण प्राधिकारी’ के पास पहुंच जाएगा. यदि वहां भी काम पूरा नहीं होता, तो मामला सीधे ‘दिल्ली राइट टू सर्विस आयोग’ के पास स्थानांतरित हो जाएगा. यह ‘जीरो-लेवल’ की जवाबदेही प्रणाली नागरिकों को अनावश्यक दफ्तरों के चक्कर काटने से मुक्ति दिलाएगी।

डिजिटल क्रांति से होगा सेवाओं का वितरण मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा कि दिल्ली सरकार एक ऐसी पारदर्शी व्यवस्था बनाने जा रही है, जो पूरी तरह से तकनीक पर आधारित हो. उन्होंने कहा कि आवेदन से लेकर सेवा मिलने तक की प्रक्रिया ऑनलाइन होगी. हर आवेदक को एक ‘यूनिक एप्लीकेशन नंबर’ दिया जाएगा, जिससे नागरिक घर बैठे अपने आवेदन की ‘रियल-टाइम’ स्थिति देख सकेंगे. यह नई व्यवस्था वर्ष 2011 के पुराने कानून की जगह लेगी और अधिक आधुनिक तथा प्रभावी होगी।

स्वतंत्र आयोग करेगा निगरानी:
इस कानून के सुचारू कार्यान्वयन के लिए एक स्वतंत्र और वैधानिक ‘दिल्ली राइट टू सर्विस आयोग’ का गठन किया जाएगा. इसमें एक अध्यक्ष और सदस्य होंगे, जो द्वितीय अपीलों की सुनवाई करेंगे. यह आयोग न केवल सरकारी कार्यालयों का औचक निरीक्षण करेगा, बल्कि लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त विभागीय कार्रवाई की सिफारिश भी कर सकेगा. आयोग हर साल अपनी रिपोर्ट प्रकाशित करेगा, जिससे सेवाओं की गुणवत्ता और कानून के असर का आकलन जनता के सामने होगा।

सुशासन का नया मील का पत्थर:

मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने विश्वास जताया कि यह विधेयक दिल्ली के प्रशासनिक ढांचे में मील का पत्थर साबित होगा. इससे न केवल शासन में पारदर्शिता आएगी, बल्कि सरकारी सेवाओं के प्रति आम आदमी का भरोसा भी बढ़ेगा. उन्होंने कहा, “हमारा उद्देश्य दिल्ली की शासन व्यवस्था को अधिक दक्ष, संवेदनशील और पूरी तरह से नागरिक-केंद्रित बनाना है.”(साभार एजेंसी)

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