(देहरादून) 03सितंबर,2026.
मैती संस्था, यूकॉस्ट एवं हेस्को के संयुक्त तत्वावधान में “बुग्याल संरक्षण दिवस” देहरादून स्थित उत्तराखंड संस्कृति विभाग के ऑडिटोरियम में आयोजित हुआ।
इस अवसर पर “उत्तराखण्ड के अल्पाइन घास के मैदानों (बुग्यालों) का संरक्षण: वैज्ञानिक दृष्टिकोण, पारंपरिक ज्ञान एवं संरक्षण कार्यवाही” विषय पर एक महत्वपूर्ण सेमिनार का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ मैती संस्था के संस्थापक एवं सचिव पद्म श्री डॉ. कल्याण सिंह रावत के स्वागत संबोधन से हुआ।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि माननीय श्री सुबोध उनियाल, कैबिनेट मंत्री (वन, चिकित्सा स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा निर्वाचन विधायक एवं संसदीय कार्य) उत्तराखंड सरकार ने बुग्यालों के संरक्षण के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उत्तराखण्ड वन विभाग द्वारा प्रत्येक वर्ष बुग्याल दिवस मनाया जाएगा, ताकि स्थानीय लोगों एवं आम जनमानस को बुग्यालों के संरक्षण के प्रति जागरूक किया जा सके।
कार्यक्रम के अति विशिष्ट अतिथि पद्म भूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी, संस्थापक–हेस्को ने हिमालय दिवस के महत्व पर प्रकाश डालते हुए हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण को वर्तमान समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता बताया। उन्होंने हिमालय और इसके प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में जनभागीदारी एवं स्थानीय स्तर पर जागरूकता को महत्वपूर्ण बताया।
विशिष्ट अतिथि प्रो. दुर्गेश पंत, महानिदेशक, उत्तराखण्ड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद् (यूकॉस्ट) ने विज्ञान एवं तकनीकी नवाचार के माध्यम से हिमालयी पर्यावरण और बुग्यालों के संरक्षण की आवश्यकता पर विचार व्यक्त किए।
श्री सुशांत कुमार पटनायक (IFS), मुख्य वन संरक्षक–पर्यावरण, वन विभाग, उत्तराखण्ड शासन ने बुग्यालों के पर्यावरणीय महत्व तथा इनके संरक्षण के लिए प्रभावी कार्यवाही और सामुदायिक सहभागिता की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।
डॉ. जी. एस. रावत, पूर्व निदेशक, भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII), डॉ. गजेन्द्र सिंह, वैज्ञानिक, उत्तराखण्ड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र (USAC), देहरादून, डॉ. जी. सी. एस. नेगी, एमेरिटस वैज्ञानिक, मानसखंड विज्ञान केंद्र, अल्मोड़ा, डॉ. डी. पी. उनियाल, संयुक्त निदेशक, यूकॉस्ट, उत्तराखण्ड वन विभाग की अपर सचिव सुश्री कल्याणी नेगी, प्रसिद्ध फोटोग्राफर पद्मश्री श्री अनूप शाह ने संबंधित विषयों पर व्याख्यान दिए।
कार्यक्रम का उद्देश्य उत्तराखण्ड के बुग्यालों के संरक्षण से संबंधित वैज्ञानिक शोध, पारंपरिक ज्ञान, स्थानीय अनुभवों तथा प्रभावी संरक्षण कार्यों पर विशेषज्ञों एवं विभिन्न हितधारकों के बीच विचार-विमर्श करना था।
कार्यक्रम के अवसर पर पर्यावरण, विज्ञान, शिक्षा, सामाजिक जागरूकता एवं संरक्षण के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए ‘गिरि गंगा गौरव सम्मान’ तथा ‘मैती सम्मान’ प्रदान किए गए।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने सामूहिक रूप से इस बात पर जोर दिया कि उत्तराखण्ड के बुग्याल केवल उच्च हिमालयी क्षेत्रों के घास के मैदान नहीं, बल्कि राज्य की जैव विविधता, जल स्रोतों, पारिस्थितिकी, स्थानीय आजीविका एवं सांस्कृतिक विरासत के महत्वपूर्ण आधार हैं। इनके संरक्षण के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान, पारंपरिक ज्ञान, स्थानीय समुदायों की सहभागिता तथा प्रभावी सरकारी संरक्षण कार्यवाही का समन्वय आवश्यक है। कार्यक्रम में CIMS संस्थान, डॉल्फिन इंस्टीट्यूट, उत्तरांचल विश्वविद्यालय आदि के विद्यार्थियों, संयुक्त नागरिक संगठन देहरादून के सदस्यों, भारत ज्ञान विज्ञान समिति के सदस्यों एवं विभिन्न संस्थाओं के वैज्ञानिकों एवं शिक्षकों सहित 150 से अधिक लोगों द्वारा कार्यक्रम में सहभाग किया गया।(साभार)
