(नई दिल्ली)28जुलाई,2026
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि केंद्र सरकार को आपराधिक कानून में डिजिटल अरेस्ट को औपचारिक रूप से परिभाषित करने और इसे कड़ी सजा वाले अलग अपराध के रूप में शामिल करने पर विचार करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में अगर ठोस और तर्कसंगत साक्ष्यों के आधार पर किसी आरोपी के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनता है तो उसकी संपत्ति फ्रीज की जा सकती है।
डिजिटल अरेस्ट साइबर अपराध का तेजी से बढ़ता तरीका है, जिसमें ठग खुद को पुलिस, अदालत या सरकारी एजेंसियों का अधिकारी बताकर ऑडियो और वीडियो कॉल के जरिए लोगों को डराते हैं। इसके बाद वे उन्हें मानसिक रूप से बंधक बनाकर पैसे देने का दबाव नहीं दे सकते हैं।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने एक सुनवाई के दौरान ये कहा। वहीं, अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत को बताया कि डिजिटल अरेस्ट से जुड़े अपराधों का प्रावधान पहले से कानून में मौजूद है। उन्होंने कहा कि विभिन्न विभागों की एक अंतर-विभागीय समिति (आईडीसी) व्यवस्था में मौजूद कमियों की पहचान के लिए एक व्यापक रिपोर्ट तैयार कर रही है।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम अदालत को बताया कि सरकार डीपफेक और डिजिटल अरेस्ट जैसे मामलों से निपटने के लिए नया कानून तैयार कर रही है। उन्होंने कहा, “एक मसौदा विधेयक तैयार किया जा रहा है। संभव है कि उसमें डिजिटल अरेस्ट, डीपफेक और अन्य ऑनलाइन अपराधों से जुड़े प्रावधान शामिल हों।”
अटॉर्नी जनरल ने यह भी बताया कि केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) इस समय 10 करोड़ रुपये या उससे अधिक की धोखाधड़ी वाले लगभग 20 बड़े डिजिटल फ्रॉड मामलों की जांच कर रहा है, जबकि अन्य मामलों की जांच राज्य पुलिस कर रही है।(साभार एजेंसी)
